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मेरा बचपन, मेरा शायान

  ग़ज़ल — मेरा बचपन, मेरा शायान आज बेटे के दाख़िले ने ये एहसास दिलाया, इक दौर था अपना भी, जो लौटकर न आया। वो बस्ता, वो किताबें, वो स्कूल की इमारत, हर ज़र्रा मुझे बचपन की यादों में ले आया। अपने ही बचपन की झलक बच्चे में देखी, दिल यादों के समंदर में डूबता चला आया। वो बचपन की शोख़ियाँ, वो बेफ़िक्र-सी हँसी, हर भूला हुआ मंज़र आँखों में समाया। जिस राह पे उँगली पकड़कर कभी चले थे, उसी राह पे बच्चे को लेकर क़दम बढ़ाया। कल तक जो हमारी ही उँगली थामे चलता, आज उसको नई राह पे चलते हुए पाया। हम सोचते थे वक़्त गुज़रता है धीरे-धीरे, बच्चे को बड़ा होते देखा, तो होश आया। जिस उम्र में हम ख़ुद भी खिलौनों से खेले थे, उस उम्र में बच्चे को किताबों से मिलाया। कुछ यादें थीं जो वक़्त की तह में छुपी हुई थीं, बेटे के बहाने हर इक मंज़र नज़र आया। वो दिन भी थे कि हमको बड़ा होने की जल्दी थी, अब वक़्त ने पलटकर वही बचपन दिखाया। शायान के बहाने ये जाना है हमने, बचपन तो चला जाता है, फिर लौटकर न आया। ©सदफ©

एक जीवन

एक ही जीवन है, कितना अनमोल, कितना सुंदर। हर सांस एक नया गीत, हर सुबह एक नई रोशनी। न शिकायतों का बोझ, न अधूरी चाहों की दीवार। बस प्यार, मुस्कान और सपने, यही है जीवन का असली सार। चलो जी लें इस पल को, जैसे यह आख़िरी हो। क्योंकि एक ही जीवन है, और यही सबसे बड़ी रोशनी हो। @सदफ@

नानी माँ

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 नानी माँ आसमां में बन गई है इक तारा। अब भी है वो हमारी आंखों का सितारा।। कहाँ ढूंढू, कहाँ से लाऊं वो हसीन तारा। जो अब नहीं है हमारी ज़मीं का सितारा।। जब भी देखती हूं आसमां का कोई तारा। लगे जैसे वो नानी के मुख वाला सितारा।। बादलों में जब न दिखता वो सांझ का तारा। तब लगता है कहां है वो अनमोल सितारा।। जो था अभी यहीं, कहां गुमशुदा है वो तारा। समझ न आए बादलों में छिपा है वो सितारा।। ये आंख मिचौली करते हैं बादल और तारा। डर के साए में उलझाते, खो जाता वो सितारा।। @सदफ @

सफ़र

आज तुमसे जुदा होने का वक्त आ गया है  इस बात से मन बड़ा ही बोझिल हो रहा है  शायद हम दोनों का इतना ही साथ लिखा है  तुम अपने रास्ते हम अपने रास्ते को रवाना है  हमने तुमको अपनी मेहनत से संवारा हैं  दिन रात एक करके तुमको पूर्ण बनाया है  कुछ कंटीली पतवारों ने राह को रोकना तो चाहा है लेकिन हमारा तुम्हारा सफर बड़ा ही सुहाना रहा है हमारा तुम्हारा सफर कुछ यूं शुरू हुआ है  वर्ष 2018 में मैंने तुमको पास किया है  माह सितंबर दिनांक 24 को तुमसे मिलन हुआ है  और उसी दिन मेरे जन्म का भी दिवस होता है  लेकिन तुम्हें खुद से अलग करना मेरी जरूरत  ये बात मन को कचोट रही है
 यूं ज़िंदगी के ख़्वाब दिखा गया कोई  मुस्कुराके अपना बना गया कोई बहती हुई हवाओं को यूं थाम ले गया कोई सावन में आके कोयल का गीत सुना गया कोई  यूं अपने प्यार की हवा से गम को मिटा गया कोई मीठे सपनों में आके अपना बना गया कोई  धूल लगी किताब के पन्ने पलट गया कोई उसमें सूखे हुए गुलाब की याद दिला गया कोई  यूं ज़िंदगी में फिर से प्यार की बरसात दे गया कोई  बिन आहट के इस दिल में जगह बना गया कोई यूं फिर से मुझे जीने का मकसद सीखा गया कोई बिन आहट अपना बना गया कोई❤️❤️❤️ 💞💞💞💞💞💞💞💞💞 शालिनी मोहतरमा आपके लिए।   आपकी अपनी सदफ💕💗

वो गुज़रा हुआ हर लम्हा शिद्दत से याद आता है

आज वो पहली मुलाकात का किस्सा याद आता है स्कूल में अभिवादन करने का मंजर नज़र  आता है हिंदी की अलख जलाने की आपकी ज़िद का  वो गुज़रा हुआ  हर लम्हा शिद्दत से  याद आता है आप जैसी हिंदी की टीचर का बोलना याद आता है आपके सवालों का उत्तर न देने का मलाल होता है लेकिन आपके हिंदी में समझाने के उन अभिकथनों का  वो गुज़रा हुआ हर लम्हा शिद्दत से याद आता है मेरी ज़िंदगी के रंजोगम में आपका दखल देना याद आता है मां के किरदार को निभाकर आपका समझाना याद आता है आपके अपनेपन के एहसासों की सरगोशी का वो गुज़रा हुआ हर लम्हा शिद्दत से याद आता है आपका वो गले लगाकर हक जताना याद आता है ज़िंदगी की उलझनों के दलदल से निकलना याद आता है लोगों की भीड़ के हमदर्दों में आपकी हमदर्दी का वो गुज़रा हुआ हर लम्हा शिद्दत से याद आता है हिंदी की दुनिया में मुझे भेजने का वो सपना याद आता है मेरे किरदार को बदलने का सारा श्रेय आपको जाता है कांटो की डगर पर आपकी उंगली पकड़ कर चलने का वो गुज़रा हुआ हर लम्हा शिद्दत से याद आता है  ज़िंदगी के मुकाम को पाने में आपका सहयोग याद आता है आपकी हर बात में सच्चाई का आइना नजर...

पी एच डी का दर्द कोई नहीं समझता

 सुबह से शाम हो गई लिखते लिखते  लेकिन कुछ न लिख पाए  हालत ये हो गई है हमारी ज़माने में कि इसका दर्द हम किसी को कह नहीं पाते