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रिश्तों की गर्मजोशी का ठंडापन

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रिश्तों की सर्द ज़द में हम पिघलने लगे धीरे धीरे खुद को हम उसमें समाने लगे यूँ तो हमारा एक वजूद हुआ करता था पर उसकी चाहत में हम खुद को मिटाने लगे रिश्तों की इस मिठास में हम खोने लगे अपने जज़्बातों को सरेआम करने लगे रिश्तों की गर्माहाट का यूँ असर हुआ कि हम अपने वजूद को खुद ही बदलने लगे अपनी चाहत को हम आसमां समझने लगे इस रिश्ते को मसरूफ़ियत में से समय देने लगे हमारी दीवानगी का आलम कुछ यूँ हुआ कि सब कुछ छोड़ हम, उनको तवज्जो देने लगे वो हमारी अना को फना करके उछलने लगे हमारे जज़्बातों को सरेआम कुचलने लगे ऐ सदफ इस टूटे दिल का फ़साना यूँ हुआ कि रिश्तों की गर्मजोशी को हम,ठंडेपन में बदलने लगे सदफ़

रिश्तों की टूटती डोर

रिश्ते धीमी आंच पर दहकते कोएलों की तरह जल रहे थे सर्द नाज़ुक मौसम की शबनमी बूंदों से लिपट रो रहे थे क्या कहने ऐसे हसीन दर्दनाक रिश्तों की सौगातों को जो दिलों को जोड़ने के बजाए उनकी नीलामी कर रहे थे फलसफा इतना ही नहीं, ये मखमली बयान कर रहे थे दरअसल बनावटी रिश्तों के मर्म को पहचानना सिखा रहे थे क्या कहने ऐसे बेवफा रिश्तों की सुगबुगाहटों को जो ठंडे पड़े रिश्तों को मीठी गर्माहट देने को सोच रहे थे

मिलन की सांझ

 ट्रेन की रफ़्तार ने तूफ़ान की तरह गति पकड़ ली है, आसमां को बादलों ने अपनी बाहें फैलाकर ढक लिया है, पेड़ो ने लहलाहना शुरू कर दिया है , तितलियों ने नाचना शुरू कर दिया है , भंवरों ने गुनगुनाना शुरू कर दिया है, चारों और फूलों ने अपनी सुगंधित खुशबू बिखेरना शुरू कर दी है। दरअसल आज पूरे दो महीने बाद सलोनी अपनी प्रीत से मिलने जा रही है ।उससे मिलने की खुशी में सलोनी को अपना कोई खयाल नहीं है । कहाँ तो पूरा शहर लॉक डाउन के नियमों के पालन में व्यस्त है उधर सलोनी अपनी ही धुन में बिना कुछ सोचे समझे निकल पड़ी है प्रीत की झलक पाने को।  इन दो महीनों में सलोनी की बेचैनी की गवाही उसका तकिया आसानी से बयाँ कर देगा। बिस्तर पर करवट बदलते रातों की निंदिया तो सलोनी की आंखों से ओझल हो चुकी थी ।अगर सोना भी चाहे तो उस पर प्रीत की यादें हावी हो जाती, बस फिर क्या? तकिये को गीला होने में कुछ ही सैकेंड्स लगते। ये सिलसिला दो महीने से यूहीं चल रहा था।आखिरकार सलोनी इस सिलसिले को आगे बढ़ाना नहीं चाहती थी।बस इसलिए आज ट्रेन में सवार हो गई....अपनी प्रीत से मिलने के लिये। सलोनी दो वर्ष पहले ही तो मिली थी प्रीत से। एक दिन...

ग़ज़ल ख़्वाब

एक दिन ख़्वाबों की दुनिया को कुछ यूँ सजाया हमने  कि ख्वाहिशों को बस लबों से सरेआम दिया कुचलने  गुफ़्तगू की साजिशों में हमें इस क़दर उलझाया उन्होंने  कि हसरतों पे चिलमन डालकर बेइंतेहा रुलाया हमें  फूटकर निकले जो दिल से वसवसों ने समझाया मुझे  कि वो उन ख़्वाबों का अक्स है जिसने कभी हंसाया तुझे  आज वो अंधेरे का मबूल जो दिया कभी जलाया उन्होंने  कि आँसूओं के सैलाब ने फिर से बाती बना जलाया उसे  सदफ ये ख़्वाबों का काफ़िला इस क़दर सुर्ख़ हुआ तुझसे  कि कहीं ये आगोशियाँ न टूट जाए बिन पूरा ख़्वाब हुए  /सदफ/

अस्तित्व की पहचान

जिंदगी के लिये हर पल लड़ना होता है अस्तित्व बोध के लिए झगड़ना होता है जितना पाया उस पर नाज़ तो होता है लेकिन हरदम ऊँचाइयों के लिए चढ़ना होता है खुद को मंजिल की बैसाखी बनाना होता है अपनी पहचान का जुगनू जलाना होता है भले ही लोगों को सूरत से पहचानना होता है लेकिन मुझे अपने काम से नाम कमाना  होता है तमन्नाओं की श्रंखला में हीरा जोड़ना होता है मेहनत के मोतियों को गाँठी में पिरोना होता है कहीं सपने टूट न जायें कच्चे धागों की तरह बस यही डर दिमाग से हटाना होता है कशमकश में उलझी जिंदगी को बुनना होता है परत दर परत खुलती जिंदगी को संवारना होता है ऐ सदफ इसी उधेड़बुन के ताने बाने को बुनते बुनते अपने अस्तित्व की तलाश को खोजना होता है ::::सदफ:::::

जज्बातों के एहसास

जज़्बात तो जज़्बात होते हैं बस उनके सौदे नहीं होते हैं           / भले ही उन पर तगड़ी सील लगानी पड़े लेकिन सरेआम उनको नीलाम नहीं करते           / जज़्बातों से जो चिलमन उठ गया तो समझो वफ़ा पे ऐतबार न रहा           / गर भरोसा है अपने जज़्बातों पर तुमको तो उनके सहारे जिंदगी की खुद ढाल बनो           / यही है सिर्फ़ जज़्बातों से वफ़ा-एह-ले वरना दगा तो हमारे एहसास भी दे देते हैं """""@सदफ@"""""

दुश्मनों की फौज

दुश्मनों का लम्बा हुजूम भी होगा उनके छिपे वारों का वार भी होगा ज़रा सफलता की सीढ़ी चढ़ना तो साहिब दोस्त भी छिपे लिबास में दुश्मन होगा जलना तो लोगों की फ़ितरत में होगा ऊपर से अंगारें बरसाना भी शौक होगा भीड़ से अलग चलने का हुनर हुआ जो साहिब तो परिवार में भी गिरगिटी दुश्मन होगा आरज़ू है अगर तो जुस्तजू का भी जुगनू होगा बस उसी की रोशनी में खुद को चमकाना होगा छूना है जो रंग बिरंगी आसमानी तारों को ए साहिब तो हर मुखौटाधारी दुश्मन को पहचानना होगा गर पहचानकर जो आवाज़ उठाने का हुनर होगा तो समझो शराफ़त का नकाब भी फिसलता होगा गर ख़ुद को आज़माइशो में साबित करना जो हुआ ऐ साहिब तो इन दोगली शख्सियतों का मुँह कुचलना होगा @"""सदफ"""@